पोक्सो एक्ट 2012 ।

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समाज में बच्चों के प्रति बढ़ते हुए अपराधों के समुचित उपचार एवं उनके नियंत्रण के लिए लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 (पोक्सो एक्ट ) लाया गया था । 

•यह अधिनियम 1 जून 2012 को पारित हुआ तथा 14 नवंबर 2012 को इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया ।

हाल में किए गए संशोधन

• 12 कम उम्र की बच्ची के साथ किए गए बलात्कार में मृत्युदंड की सजा का प्रावधान किया गया । 

• 12 वर्ष से अधिक तथा 16 वर्ष से कम की बच्ची के साथ बलात्कार की घटना में 20 वर्ष का कारावास या उम्रकैद या फांसी की सजा दी जाएगी ।

इस अधिनियम के तहत निम्नलिखित दंडनीय अपराध घोषित किए गए हैं -

धारा 3 - प्रवेशन लैंगिक हमला की परिभाषा

धारा 4 - प्रवेशन लैंगिक हमला के लिए सजा का प्रावधान

धारा 5 - गुरुत्तर प्रवेशन लैंगिक हमला की परिभाषा

धारा 6 - गुरुत्तर प्रवेशन लैंगिक हमला की सजा

धारा 7- लैंगिक हमला परिभाषा

धारा 8 - लैंगिक हमला के लिए सजा का प्रावधान

धारा 11-  लैंगिक उत्पीड़न की परिभाषा 

धारा 12 - लैंगिक उत्पीड़न के लिए सजा का प्रावधान

 धारा 13 -  बालक का अश्लील प्रयोजनों के लिए उपयोग

धारा 14 - अश्लील प्रयोजनों के लिए सजा का प्रावधान


धारा 3 - प्रवेशन लैंगिक हमला

 परिभाषा :- किसी व्यक्ति द्वारा जब अपना लिंग किसी भी सीमा तक बच्चे की योनि , मूत्रमार्ग, मुंह या गुदा में प्रवेश करता है या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसके साथ करवाता है । 

धारा 4 - प्रवेशन लैंगिक हमला के लिए सजा का प्रावधान । 
• कम से कम 7 वर्ष अधिकतम , आजीवन कारावास + जुर्माना । या जुर्माना तथा सजा दोनों हो सकती है । 

धारा 5 - गुरुत्तर प्रवेशन लैंगिक हमला 

 परिभाषा :-  जब प्रवेशन लैंगिक हमला किसी लोक सेवक अथवा सरकारी कर्मचारी द्वारा किया जाता है । जैसे :- पुलिस , डाक्टर या संरक्षण अधिकारी द्वारा ।

धारा 6 - गुरुत्तर प्रवेशन लैंगिक हमला की सजा 

कम से कम 10 वर्ष अधिकतम आजीवन + जूर्माना

धारा 7- लैंगिक हमला

परिभाषा :- यदि किसी व्यक्ति द्वारा लैंगिक आशय से  बालक के शारीरिक अंगों को स्पष्ट करता है या ऐसे व्यक्ति द्वारा शारीरिक अंगों को स्पर्श करवाने का कार्य करवाता है जिसे लैंगिक हमला कहा जाता हैं। 


धारा 8 - लैंगिक हमला के लिए सजा का प्रावधान
कम से कम 3 वर्ष की सजा का प्रावधान तथा अधिकतम 5 वर्ष तक हो सकता है + जुर्माना ।

धारा 11 लैंगिक उत्पीड़न की परिभाषा 
 
यदि कोई व्यक्ति लैंगिक आशय से बालक के साथ निम्न में से कोई कार्य करें

 • लैंगिक शब्द अथवा गाली का प्रयोग।

• अश्लील प्रायोजन के लिए बच्चों का इस्तेमाल । 

• बच्चों की पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्री ढूंढना अथवा देखना अथवा किसी अन्य व्यक्ति को भेजना।

• किसी सामाजिक नेटवर्क पर बच्चे को लैंगिक आशय से प्रदर्शित करना।

धारा 12 - लैंगिक उत्पीड़न के लिए सजा का प्रावधान
• कम से कम 3 वर्ष की सजा तथा अधिकतम 5 वर्ष तक +  जुर्माना

धारा 13 बालक का अश्लील प्रयोजनों के लिए उपयोग

• किसी बालक की जनन इंद्रियों का प्रदर्शन करना ।

• किसी बालक का अशोभनीय या अश्लील प्रदर्शन करना ।

• किसी बालक का उपयोग वास्तविक या नकली लैंगिक कार्यों में प्रवेशन या उसके बिना करना ।

• अश्लील प्रयोजन के लिए बच्चों का इस्तेमाल करना।

धारा 14 - अश्लील प्रयोजनों के लिए सजा का प्रावधान 
कम से कम 5 वर्ष की सजा तथा अधिकतम 10 वर्ष की सजा + जुर्माना | 

नोट :- 

1. अगर कोई व्यक्ति इस अधिनियम के तहत झूठी शिकायत दर्ज करवाता है तो उसको 6 माह की सजा का प्रावधान है । 

2. अपराध की रिपोर्ट स्थानीय पुलिस स्टेशन में विशेष किशोर इकाई में दर्ज की जाएगी ।

3. पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज होने के पश्चात 24 घंटों के भीतर इसकी जानकारी विशेष न्यायालय तथा बाल कल्याण समिति देनी आवश्यक है ।

4. यह अधिनियम बाल संरक्षण की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपी जाती है । 
•इसमें पुलिस बच्चे की देखभाल और संरक्षण के लिए तत्काल व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी दी जाती है ।
जैसे :- बच्चे के आपातकालीन चिकित्सा उपचार करवाना,  बच्चे को आश्रय गृह उपलब्ध करवाना ।


5. इस अधिनियम के अंतर्गत विशेष न्यायालय बनाने का प्रावधान है। इन विशेष न्यायालयों की स्थापना राज्य सरकार तथा उच्च न्यायालय की सिफारिश से होती है।

6. वर्तमान में प्रत्येक जिले में सेशन न्यायालय को विशेष न्यायालय घोषित किया गया है।

7. न्यायालय सुनवाई को 1 वर्ष में पूरा करेगा तथा सुनवाई पूर्ण रूप से एक गोपनीय तथा बंद कमरे में होंगी।

8.मीडिया के द्वारा बच्चे की पहचान घोषित करने पर रोक है।

9. अगर अपराध किसी बच्चे के द्वारा किया गया हो तो उसकी सुनवाई किशोर न्याय अधिनियम 2000 के अंतर्गत की जाएगी।

10.राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग तथा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग इस अधिनियम की निगरानी रखेंगे तथा प्रावधानों को क्रियान्वित करेंगे।

11. मेडिकल जांच की बच्चे के माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में किया जाना चाहिए जिस पर बच्चे का विश्वास हो और बच्ची की मेडिकल जांच के लिए महिला चिकित्सक द्वारा ही की जानी चाहिए। 

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