राजस्थान के प्रमुख लोकदेवता।

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राजस्थान के पंच पीरों के बारे में एक प्रसिद्ध दोहा :- 
पाबू, हड़बू, रामदे, मेहा मांगलिया, 
पांचो पीर पधारज्यों, गोगाजी जेहा॥

1.गोगाजी :-

• जन्म - भाद्रपद कृष्ण नवमी , ददरेवा (चुरू) 946 ईस्वी में । 
• पिता - जेवर सिंह । 
• माता - बाछलदे । 
• पत्नी - केलमदे । 
• ससुर - बुडोजी , कोलू मंड के ।
• सांपों के देवता । 
• राजस्थान के पंच पीर में शामिल ।
• गोगा जी का जन्म ददरेवा चुरू में हुआ था ।
• इन की समाधि गोगामेडी नोहर हनुमानगढ़ में स्थित है । 

• मंदिर का निर्माता फिरोजशाह तुगलक परन्तु वर्तमान मन्दिर का निर्माण महाराजा गंगासिंह ने करवाया था।
• राजस्थान में किसान वर्षा के बाद गोगाजी के नाम की गोगा राखड़ी हल, राखी दोनों बांधते हैं।

• गोगाजी की ओल्डी - किलौरियो की ढ़ाणी ,सांचौर , जालौर
• गोगाजी के भोपे डेरु वाद्य यंत्र का प्रयोग करते हैं

• गोगाजी की पूजा खेजड़ी के वृक्ष के नीचे होती है इसलिए कहा जाता है कि "गांव गांव खेजड़ी ,गांव गांव गोगाजी "
• गोगाजी को मोहम्मद गजनवी ने जाहर पीर अर्थात साक्षात देवता का है | 

• गोगामेडी में भाद्रपद माह में पूजा हिंदुओं द्वारा की जाती है तथा अन्य महीनों में वहां पूजा मुस्लिम द्वारा की जाती है ।

• गोगाजी की सवारी नीली घोड़ी जिसे गोगा बप्पा कहा जाता है।

• इनकी पूजा जाहरपीर, गोगापीर, सांपो का देवता व गो रक्षक के रूप में की जाती है ।

2. पाबूजी

जन्म :- 1239 ईं. कोलू ,फलौदी (जोधपुर)
पिता का नाम :- धांधलजी |
माता का नाम :- कमलादे |
• पत्नी :- सुप्यारदे/फूलमदे |
अवतार :- लक्ष्मण का |
घोडी का नाम :- केसर कालमी |

• राठौडों के मूल पुरुष राव सीहा के वंशज |
• ऊँट के बीमार होने पर पाबूजी की पूजा की जाती है ।

 • पाबूजी का प्रतीक चिन्ह भाला लिए अश्वारोही | 
 • इनके पवाडों प्रमुख वाद्ययंत्र माठ होता है ।

• ऊँटों की रखने वाले रांईका (रेबारी) जाति इन्हें अपना आराध्य देव मानती है ।
• मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊँट लाने का श्रेय पाबूजी को दिया जाता है ।

• पाबूजी की फड़ नायक जाति के भोपो द्वारा 'रावणहत्या' वाद्य के साथ बांची जाती है ।

• ये फेरों के बीच से ही उठकर (साढे तीन फेरे)अपने बहनोई जीन्दराव खींची से देवल चारणी ( जिसकी कैसर कालमी घोडी ये मांगकर लाये ) की गायें छुडाने चले गये और देचूं गाँव (जोधपुर) में वीर गति को प्राप्त हुए ।

• आशिया मोडजी द्वारा रचित " पाबू प्रकाश " पाबूजी के जीवन पर आधारित एक महत्वपूर्ण रचना है ।

 3. रामदेवजी

• जन्म - 1405 ई. उण्ण्डु, काश्मर गाँव, शिव तहसील, बाड़मेर ।
पिता - अजमल जी । 
माता - मैणादे । 
पत्नी - नैतलदे । 
गुरु - बालीनाथ ।
अवतार - कृष्ण ।
•घोड़ा - लीला । 
• बहन - सुगना ।
• धर्म बहन - डाली बाई ।

मेला - भाद्रपद शुक्ला द्वितीय से एकादशी तक ।

• रामदेवजी का मेला साम्प्रदायिक सद्भावना हेतु विश्व प्रसिद्ध है।

उपनाम :- रुणेचा रा धणी , पीरो के पीर |

देवरा :- रामदेवजी के मंदिर को देवरा कहा जाता है।

नेजा :- रामदेवजी के मंदिर पर चढ़ाई जाने वाली पंचरगा ध्वजा को नेजा कहां जाता है।

जम्मा :- रामदेवजी के रात्रि जागरण को जम्मा कहा जाता है।

रिखियां :- रामदेवजी के मेघवाल जाति के भक्तो को रिखियां कहा जाता है। 

ब्यावले :- रामदेवजी की अराधना में गाये जाने वाले गीतो को ब्यावले कहां जाता है। 

जातरू :- रामदेवजी के पैदल तीर्थ यात्रीयो को जातरू कहां जाता है।

• राजस्थान का यह एकमात्र लोक देवता है जिनकी पूजा इनके पद् चिन्ह/पगल्यो के रूप में की जाती है।
रामदेवजी ने कामड़िया पंथ चलाया।

• कामड़िया पंथ की महिलाओं द्वारा रामदेवजी की मेले में तेरहताली नृत्य किया जाता है।

• रामदेवजी राजस्थान का एकमात्र लोक देवता जो कवि था।

• रामदेवजी के द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ चौबीस बाणियाँ है।


4. मेहाजी मांगलिया

मेला :- भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी ।
मदिर - बापणी गाँव, जोधपुर
घोड़ा - किरड़ काबरा

• मेहाजी मांगलिया, मांगलिया समाज के ईष्ट देव है।

• मेहाजी के बारे में लोक मान्यता है कि इनकी पूजा करने वाले भोपा की वंश वृद्धि नहीं होती और वे गोद लेकर पीढी चलाते है ।

• मेहाजी मांगलिया मारवाड़ शासक राव चूँड़ा के समकालीन थे।
•मेहाजी जैसलमेर के राव राणंगदेव भाटी से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे ।

5. हड़बूजी 

• जन्म - भुड़ेल (नागौर)
• मंदिर - बेंगटी गाँव, फलौदी तहसील, जोधपुर
• गुरु - बालीनाथ
• वाहन- सियार

• लोक देवता रामदेवजी हड़बू जी के मौसेरे भाईं थे ।

• हड़बूजी सगुन शास्त्र के ज्ञाता थे।

• हड़बूजी मारवाड़ शासक राव जौधा के समकालीन थे। इन्होंने राव जोधा को फेंटा तथा तलवार भेंट की थी ।

• राजस्थान का यह एकमात्र लोक देवता है। जिसकी पूजा लकड़ी की बनी गाड़ी के रूप में की जाती है।

6. तेजाजी

• जन्म - खड़नाल, नागौर , 1071 ईस्वी ( माघ शुक्ल चतुर्दशी )

पिता - ताहड़जी
माता - राम कवरी
पत्नी - पेमल
• नागों के देवता ।

तेजाजी की कहानी - जब तेजाजी अपनी पत्नी पेमल को लेने अपने ससुराल पनेर गए थे तब उसी दिन मेर लोग लाछा गूजरी की गाये चुरा कर ले गए । • वह गायों की मुक्त करवाने के लिए जा रहे थे बीच रास्ते में उन्हें सुरसुरा नामक स्थान पर एक आग में जलता हुआ सर्फ मिला। 
• तेजाजी ने सर्प को डसने से रोकते हुए वचन दिया कि वे गायों को मुक्त कराने के बाद स्वयं यहां आएंगे ।
• भीषण संघर्ष के बाद तेजाजी वापस सर्प के पास आए। 
• पूरे शरीर पर घाव होने के कारण उन्होंने सर्प के डसने के लिए जीभ आगे कर दी क्योंकि युद्ध से घायल शरीर पर डसने से मना कर दिया था।

• मृत्यु - भाद्रपद शुक्ल दशमी , सुरसुरा (किशनगढ़)
• मेला - भाद्रपद शुक्ल पंचमी से पूर्णिमा तक , परबतसर नागौर में ।
• तेजाजी को तलवार धारण किए हुए घोड़े पर सवार योद्धा के रूप में दर्शाया जाता है जिसकी जीभ को सर्प डस रहा है।
• सर्पदंश एक व्यक्ति को दाएं पैर पर गोगाजी की तात (डोरी ) बांधी जाती है।

7. मल्लीनाथ जी 

• जन्म - 1358 ईस्वी, रावल सलखा और जाणीदे के घर  पर हुआ।
• पत्नी - रूपादे
• 1399 - मारवाड़ के सारे संतो को एकत्रित करके एक बड़ी हरि कीर्तन आयोजित करवाई।
• 1374 - राजा बने।
• 1378 फिरोज तुगलक के साथ युद्ध।
• 1389 - उगमसी भाटी के शिष्य बने।
 
• मंदिर - लूनी नदी के तट पर ,तिलवाड़ा, बाड़मेर
• मेला - प्रतिवर्ष क्षेत्र कृष्णा एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक ( पशु मेला )
• जोधपुर के पश्चिमी परगने का नामकरण इन्हीं के नाम पर " मालाणी " किया गया था।

8. देवनारायण जी

• जन्म - 1243 ईस्वी , भोज और सेढू गुर्जर के घर।
• पत्नी - पीपल दे
• पूजा स्थल -  आसींद ,भीलवाड़ा
• मेला - भाद्रपद शुक्ल सप्तमी
• मुख्य अनुयायी गुर्जर है जो " देवजी की फड़ तथा देव जी और बगड़ावतो से संबंध्द काव्य बगड़ावत के गायन द्वारा इनका यशोगान करते हैं।

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